सारंगढ़

सारंगढ़ महिला एवं बाल विकास में पर्यवेक्षकों के तबादले पर गरमाया विवाद.. गंभीर विसंगतियों और पक्षपात के आरोपों से प्रशासनिक हलकों में हलचल.. 2 साल मे 3 बार फेरबदल क्यों?

​​सारंगढ़-बिलाईगढ़: महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा पर्यवेक्षकों (सुपरवाइजर्स) के संबंध में जारी हालिया स्थानांतरण आदेश विवादों और सवालों के घेरे में आ गया है। प्रदेश के अन्य जिलों में जहां प्रशासनिक प्रक्रियाएं सामान्य रूप से संचालित हो रही हैं, वहीं अकेले सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में इस आदेश को लेकर विभागीय कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।

संबंधित महिला कर्मचारियों और संगठनों का कहना है कि यह आदेश न केवल प्रशासनिक संतुलन को बिगाड़ रहा है, बल्कि इससे महिला कर्मियों की सुरक्षा और कार्यदक्षता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।

​विभागीय जानकारों और प्रभावित कर्मचारियों का तर्क है कि जिस विभाग का मुख्य दायित्व महिलाओं और बच्चों का संरक्षण है, उसी विभाग में कार्यरत महिला कर्मियों की व्यक्तिगत सुरक्षा, स्वास्थ्य और पारिवारिक परिस्थितियों को आदेश जारी करते समय पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखा गया। कथित तौर पर बिना किसी ठोस प्रशासनिक आपातकाल के दूरस्थ क्षेत्रों में पदस्थापना किए जाने से महिला कर्मियों के समक्ष आवागमन और दैनिक सुरक्षा से जुड़ी व्यावहारिक समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं, जिसे लेकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की मांग उठ रही है।

​आदेश की समीक्षा करने पर नीतियों और नियमों के क्रियान्वयन में कथित असमानता के आरोप भी सामने आ रहे हैं। कर्मचारियों का दावा है कि जहां लेंधरा परियोजना में किसी भी पर्यवेक्षक का सेक्टर परिवर्तन नहीं किया गया, वहीं भटगांव सेक्टर की एक पर्यवेक्षक का सामान्य कार्यकाल पूर्ण होने से पहले ही बीते दो वर्षों में कथित रूप से तीन बार सेक्टर बदल दिया गया। बिना किसी स्पष्ट प्रशासनिक कारण के बार-बार किए जाने वाले इस प्रकार के फेरबदल को कर्मचारी वर्ग अनावश्यक मानसिक दबाव के रूप में देख रहा है।
​इसके अलावा, जारी आदेश में तथ्यात्मक और अभिलेखीय विसंगतियों को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आदेश के क्रमांक 16 में उल्लेखित पर्यवेक्षक बहतरीन चौहान के मामले में दर्शाई गई पदस्थापना प्रविष्टि को लेकर विभागीय रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में अंतर का दावा किया जा रहा है। आरोप है कि सेवा वर्ष और पदस्थापना विवरण से जुड़े दस्तावेजों के परीक्षण में गंभीर चूक हुई है, जिसके चलते वास्तविक तथ्यों के विपरीत आदेश जारी होने का संदेह पैदा होता है।

​विभागीय हलकों में यह मांग जोर पकड़ रही है कि उच्चाधिकारी इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लें। कर्मचारियों ने मांग की है कि संबंधित नोटशीट, सेवा अभिलेखों और पदस्थापना की वास्तविक अवधि की निष्पक्ष व उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही, त्रुटिपूर्ण और विसंगतियों से भरे इस आदेश को पुनर्विचार हेतु रोकते हुए, महिला कर्मियों की सुरक्षा और न्यायसंगत नियमों के आधार पर संशोधित आदेश जारी किया जाए, ताकि किसी भी कर्मचारी के साथ अन्याय की स्थिति न बने।

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