सारंगढ़

सारंगढ़:पेड़ के नीचे पढ़ने को मजबूर नौनिहाल, पांच साल से अधूरा स्कूल भवन बना शिक्षा व्यवस्था पर सवाल…

सारंगढ़। शिक्षा के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के सरकारी दावों के बीच सारंगढ़ जिले के वन ग्राम शिवपुरी की तस्वीर बेहद चिंताजनक है। जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल टमटोरा रेस्ट हाउस से महज एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित प्राथमिक शाला शिवपुरी में मासूम बच्चे आज भी पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
जानकारी के अनुसार, गांव का पुराना स्कूल भवन जर्जर होने के कारण उसे तोड़ दिया गया था। इसके बाद वर्ष 2021-22 में डीएमएफ मद से नए भवन निर्माण की स्वीकृति मिली और निर्माण कार्य शुरू हुआ, लेकिन ग्राम पंचायत की लापरवाही और सुस्त कार्यप्रणाली के चलते पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी भवन अधूरा पड़ा हुआ है।
स्कूल भवन अधूरा रहने के कारण विद्यालय का संचालन वन विभाग के पुराने और जर्जर परिसर रक्षक भवन में किया जा रहा है। इस भवन में न बिजली की व्यवस्था है और न ही पंखे की सुविधा। भीषण गर्मी और उमस से परेशान शिक्षक मजबूरी में तालाब किनारे इमली के पेड़ की छांव में बच्चों की कक्षाएं संचालित कर रहे हैं।
बरसात के मौसम में हालात और भी भयावह हो जाते हैं। जिस भवन में स्कूल संचालित हो रहा है, उसकी छत जगह-जगह से टपकती है। वन विभाग करीब 15 वर्ष पहले ही इस भवन को अनुपयोगी घोषित कर छोड़ चुका है। ऐसे में बारिश के दौरान बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी, यह बड़ा सवाल बन गया है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि टमटोरा संकुल के अंतर्गत आने वाले इस विद्यालय का पिछले पांच वर्षों में विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) और जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) द्वारा एक बार भी निरीक्षण नहीं किया गया। निरीक्षण के नाम पर केवल संकुल प्राचार्य और समन्वयक की औपचारिक उपस्थिति ही दर्ज होती रही।
विद्यालय के प्रधानपाठक दारा सिंह सिदार ने बताया कि स्कूल की बदहाल स्थिति और भवन निर्माण में हो रही देरी को लेकर कई बार विभागीय अधिकारियों को लिखित पत्र भेजे गए, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
अब बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार शिक्षा के क्षेत्र में करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा कर रही है, तब वनांचल के मासूम बच्चों को बुनियादी सुविधाओं से आखिर क्यों वंचित रखा जा रहा है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता और ग्राम पंचायत की लापरवाही के बीच इन बच्चों का भविष्य यूं ही अधर में लटका रहेगा, या फिर प्रशासन इस गंभीर समस्या पर जल्द कोई ठोस कदम उठाएगा?

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