सारंगढ़

सारंगढ़ की शार्वी ने चक्रधर समारोह में बिखेरा कथक का जादू…सुर-ताल और घुंघरुओं की गूंज में साकार हुई आदिशक्ति की भावमयी अभिव्यक्ति….

सारंगढ़। 41वें चक्रधर समारोह 2026 की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा में 22 सितंबर का दिन सारंगढ़ की कथक साधिका सुश्री शार्वी केशरवानी की मनोहारी शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुति के नाम रहा। समारोह की भावभूमि “सुर, ताल, छंद और घुंघरू के 41 बरस” को साकार करते हुए शार्वी ने कथक के माध्यम से आदिशक्ति के त्रिविध स्वरूप महादुर्गा, महासरस्वती एवं महाकाली की भावपूर्ण अभिव्यक्ति प्रस्तुत की।
उनकी प्रस्तुति में भक्ति, शक्ति और शास्त्रीय नृत्य-सौंदर्य का अद्भुत समन्वय देखने को मिला। शार्वी ने तोड़े, टुकड़े, चक्करदार तोड़े, परन, लड़ी और तिहाइयों के माध्यम से ताल एवं लय की विविध छटाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। अंग-संचालन, पद-संचालन, लयकारी और भावाभिव्यक्ति के सधे हुए तालमेल ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रस्तुति का समापन तराने की स्वर-लयमयी अभिव्यक्ति के साथ हुआ।
सारंगढ़ से चक्रधर समारोह तक 12 वर्षों की कथक साधना
पान-पानी-पालगी की नगरी सारंगढ़ की रहने वाली शार्वी केशरवानी पिछले 12 वर्षों से कथक साधना कर रही हैं। पिता डॉ. रीतेश केशरवानी एवं माता डॉ. तोषी गुप्ता की सुपुत्री शार्वी ने महज 3 वर्ष की उम्र में अपनी माता एवं कथक गुरु डॉ. तोषी गुप्ता के सान्निध्य में नृत्य की विधिवत शिक्षा शुरू की।
बाद में गुरु डॉ. राजश्री नामदेव के मार्गदर्शन में श्री राम संगीत महाविद्यालय, रायपुर से कथक की शास्त्रीय परंपरा, ताल, लय, भाव और अंग-संचालन की बारीकियों का प्रशिक्षण प्राप्त किया। दोनों गुरुओं के सतत मार्गदर्शन में उनकी कथक-साधना निरंतर आगे बढ़ रही है।
चक्रधर समारोह से शार्वी का जुड़ाव भी विशेष रहा है। इससे पहले वे 38वें चक्रधर समारोह 2023 और 39वें चक्रधर समारोह 2024 में भी कथक की प्रस्तुति दे चुकी हैं। इसके अलावा रामगढ़ महोत्सव, सिरपुर महोत्सव, राज्योत्सव सारंगढ़-बिलाईगढ़ सहित अनेक प्रतिष्ठित सांस्कृतिक आयोजनों में उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया है।
दुबई और थाईलैंड तक पहुंची कथक की साधना
शार्वी ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य की संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी प्रस्तुत किया है। दुबई और थाईलैंड में आयोजित अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कथक की प्रस्तुति देकर उन्होंने भारतीय नृत्य परंपरा का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा बेंगलुरु, उज्जैन, मथुरा, जबलपुर, उदयपुर, देहरादून, हरिद्वार, रायपुर, बिलासपुर, भिलाई, गोवा, रायगढ़, सिरपुर और रामगढ़ सहित अनेक शहरों में भी उनकी प्रस्तुतियां हो चुकी हैं।
उनकी कला-साधना को विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें दुबई गोल्ड मेडल, थाईलैंड स्वर्ण अवॉर्ड, राष्ट्रीय कला अभ्युदिता अवॉर्ड, कला साधिका सम्मान, नृत्य साधिका सम्मान, स्वर्ण नृत्य मंगलम अवॉर्ड, नृत्य रंजिनी अवॉर्ड, प्रनवम शिखामणि सम्मान, राष्ट्रीय कला वैभव सम्मान, बाल नृत्य कला श्रेष्ठ अवॉर्ड, उदितमान सम्मान, कौशल कला सम्मान, कला अलंकरण सम्मान एवं नवोदित प्रतिभा सम्मान प्रमुख हैं।
नई पीढ़ी में शास्त्रीय कला की साधना का संदेश
लखनऊ घराने की नज़ाकत, कथक की शास्त्रीय परंपरा, भावों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति और लयकारी को आत्मसात कर रही शार्वी ने अल्पायु में अपनी अलग पहचान बनाई है। 41वें चक्रधर समारोह के प्रतिष्ठित मंच पर उनकी प्रस्तुति ने न केवल सारंगढ़ की सांस्कृतिक प्रतिभा को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई, बल्कि नई पीढ़ी में शास्त्रीय कलाओं के प्रति बढ़ती रुचि और साधना को भी रेखांकित किया।

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