छत्तीसगढ़ में बौनापन हुआ कम : लेकिन संतुलन अब भी गड़बड़, लंबाई बढ़ी तो वजन कम…

छत्तीसगढ़ में बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ी ये अहम खबर है कि राज्य में पांच साल के कम आयु के बच्चों में बौनापन कम हुआ है, लेकिन इससे जुड़ा एक और तथ्य ये है कि बच्चों की लंबाई बढ़ने के साथ ही वजन में कमी आ गई।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के पांचवे और छठे दौर के आंकडों की तुलना से राज्य में बच्चों के पोषण की मिली-जुली यह तस्वीर सामने आई है।
एनएफएचएस-6 की राष्ट्रीय और राज्यवार फैक्टशीट जारी होने के बाद शेष राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की जिला फैक्टशीट भी जारी हुईं। इन नए उपलब्ध आंकड़ों से छत्तीसगढ़ में पिछले सर्वेक्षण के बाद स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति में आए बदलावों का आकलन किया जा सकता है।
बौनापन 34.6 से घटकर 27.5 प्रतिशत
एनएफएचएस (2019-21) के अनुसार, छत्तीसगढ़ में पांच साल से कम उम्र के 34.6 प्रतिशत बच्चे बौनेपन से प्रभावित थे। एनएफएचएस -6 (2023-24) में यह अनुपात घटकर 27.5 प्रतिशत रह गया। यानी सात प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज हुई। यह बच्चों की लंबाई के अनुरूप विकास के लिहाज से सकारात्मक बदलाव है। हालांकि, कम वजन वाले बच्चों का अनुपात 31.3 प्रतिशत से बढ़कर 34.7 प्रतिशत हो गया।
लंबाई बढ़ी लेकिन वजन हो गया कम
इसी तरह, लंबाई के अनुपात में कम वजन वाले बच्चों यानी वेस्टिंग का अनुपात 10.9 प्रतिशत से बढ़कर 21.1 प्रतिशत दर्ज हुआ। दूसरी ओर, गंभीर वेस्टिंग में 7.5 प्रतिशत से घटकर 6.7 प्रतिशत तक कमी आई। ये आंकड़े बताते हैं कि पोषण की समस्या को केवल एक संकेतक के आधार पर नहीं समझा जा सकता। बौनापन लंबे समय तक पोषण की कमी और विकास में रुकावट का संकेत देता है, जबकि वेस्टिंग बच्चे की लंबाई के अनुपात में कम वजन को दर्शाता है। कम वजन का संकेतक इन दोनों स्थितियों से प्रभावित हो सकता है।
राष्ट्रीय औसत से तुलना भी जरूरी
राष्ट्रीय स्तर पर पांच साल से कम उम्र के बच्चों में बौनेपन का अनुपात एनएफएचएस 5 के 35.5 प्रतिशत से घटकर एनएफएचएस -6 में 29.3 प्रतिशत रह गया। छत्तीसगढ में भी इस संकेतक में कमी आई और राज्य का अनुपात राष्ट्रीय औसत से नीचे रहा, लेकिन कम वजन वाले बच्चों का अनुपात छत्तीसगढ़ में 34.7 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 31.8 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट होता है कि बौनेपन में सुधार के बावजूद राज्य में बच्चों के पोषण की चुनौती बनी हुई है। एक अन्य महत्वपूर्ण संकेतक 6 से 23 माह की उम्र के बच्चों को पर्याप्त आहार मिलने से जुड़ा है। छतीसगढ़ में यह अनुपात 9.1 प्रतिशत से बढ़कर 12.4 प्रतिशत हुआ है। सुधार के बावजूद यह स्तर बताता है कि छोटे बच्चों को विविध आहार उपलब्ध कराने के लिए अभी बहुत काम करने की जरूरत है।