सारंगढ़

मिट्टी से संस्कृति संवार रहीं शिक्षिका प्रियंका गोस्वामी, बच्चों को सिखा रहीं विलुप्त होती मटपराई कला…

सारंगढ़। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक विरासत को सहेजने की दिशा में शासकीय प्राथमिक शाला दहिदा की शिक्षिका प्रियंका गोस्वामी सराहनीय पहल कर रही हैं। राज्यपाल शिक्षक सम्मान से सम्मानित प्रियंका गोस्वामी ने विलुप्त होती मटपराई कला को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है। वे विद्यालय के बच्चों को इस प्राचीन लोककला से जोड़कर न केवल उनकी रचनात्मक प्रतिभा को निखार रही हैं, बल्कि उन्हें अपनी मिट्टी, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान से भी परिचित करा रही हैं।

मटपराई कला छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककलाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। ग्रामीण जीवन, उत्सवों और विवाह समारोहों में इस कला से निर्मित वस्तुओं का विशेष महत्व रहा है। मिट्टी और कागज की लुगदी जैसे साधारण प्राकृतिक संसाधनों से उपयोगी वस्तुएं, खिलौने, परई, मथनी और विभिन्न प्रकार की आकृतियां तैयार करना इस कला की खास पहचान है। लेकिन आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव और प्लास्टिक से बनी वस्तुओं के बढ़ते उपयोग के कारण यह पारंपरिक कला धीरे-धीरे लोगों की दिनचर्या से दूर होती जा रही है।

ऐसे समय में प्रियंका गोस्वामी ने बच्चों को मटपराई कला का प्रशिक्षण देकर इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास शुरू किया है। उनके मार्गदर्शन में विद्यार्थी मिट्टी और कागज की लुगदी से विभिन्न कलात्मक वस्तुएं बनाना सीख रहे हैं। बच्चे प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर आकर्षक आकृतियां उकेरते हैं और अपनी कल्पनाओं को कलाकृतियों के माध्यम से आकार देते हैं। इस गतिविधि से उनमें कलात्मक अभिरुचि, धैर्य, कल्पनाशीलता और हाथों से काम करने की क्षमता विकसित हो रही है।

आज जब बच्चों का काफी समय मोबाइल और डिजिटल उपकरणों में बीत रहा है, ऐसे में दहिदा के बच्चे मिट्टी से जुड़कर अपनी रचनात्मक पहचान बना रहे हैं। यह पहल उन्हें केवल एक पारंपरिक कला सिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने और स्थानीय विरासत के प्रति सम्मान विकसित करने का अवसर भी प्रदान कर रही है।

प्रियंका गोस्वामी का मानना है कि लोककलाएं किसी भी समाज की आत्मा होती हैं। इन कलाओं में हमारी परंपराएं, जीवनशैली और पूर्वजों के अनुभव समाहित रहते हैं। यदि नई पीढ़ी को समय रहते इनसे नहीं जोड़ा गया, तो आने वाले समय में हमारी कई पारंपरिक कलाएं केवल स्मृतियों तक सिमटकर रह जाएंगी। इसी सोच के साथ वे विद्यालय में बच्चों को पारंपरिक कला से जोड़ने का निरंतर प्रयास कर रही हैं।

शिक्षिका की इस पहल से ग्रामीण संस्कृति और पारंपरिक शिल्प को संरक्षण देने की नई उम्मीद जगी है। शिक्षा विभाग और ग्रामीणों ने भी इस प्रयास की सराहना की है। मटपराई कला के माध्यम से विद्यालय में शिक्षा, रचनात्मकता और सांस्कृतिक संरक्षण का सुंदर संगम देखने को मिल रहा है।

प्रियंका गोस्वामी की यह पहल संदेश देती है कि लोकसंस्कृति को जीवित रखने के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि समर्पण, संवेदनशीलता और सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है। दहिदा के विद्यालय में मिट्टी से आकार लेती बच्चों की कलाकृतियां इस बात का प्रतीक हैं कि यदि नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ा जाए, तो विलुप्त होती लोककलाओं को फिर से नई पहचान दिलाई जा सकती है।

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